बदलते समय के साथ जरूरी है यौन शिक्षा

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बदलते माहौल में अभिभावक यौन शिक्षा जैसे विषय पर जागरूकता से सहमत हैं। नए-नए गैजेट्स को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले बच्चे जब अपने शरीर में होने वाले बदलावों से उत्सुक होकर इंटरनेट खंगालते हैं तो माता-पिता की चिता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। वजह साफ है कि यहां उन्हें भरमाने वाली जानकारियां ज्यादा हैं और समझाने वाली कम। वे आधी-अधूरी, कच्ची-पक्की और उकसाने-फुसलाने वाली चीजों के जाल में उलझ जाते हैं।

कहा जाता है ‘गलत जानकारी से सावधान रहो, वह अज्ञान से ज्यादा खतरनाक है।’ भ्रामक जानकारियों के जाल में उलझकर गुमराह होते बच्चों के लिए ही यौन शिक्षा की जरूरत आज महसूस की जा रही है।पिछले दिनों भले ही इसे अश्लील और संस्कृति के विरुद्ध ठहराए जाने वाले बयान सुनने को मिले हों, लेकिन अधिकांश अभिभावक और शिक्षाविद् मानते हैं कि यह आज के समय की जरूरत है।

संस्कृति या सुरक्षा?

अधिकतर माता-पिता मानते हैं कि स्कूल यह काम बेहतर तरीके से कर सकते हैं। विजय नगर निवासी अभिभावक दीपक मेहता कहते हैं, ‘कई बार माता-पिता के पास भी बहुत ही भ्रामक या अधूरी जानकारी होती है। यह जरूरी नहीं है कि हर माता-पिता अपने बच्चों को वैज्ञानिक ढंग से विषय के बारे में समझा सके जबकि स्कूलों के पास विषय को समझने और समझाने वाले शिक्षक होते हैं। उन्हें इस जिम्मेदारी को उठाना ही चाहिए।’

अभिभावक भले ही यौन शिक्षा की जरूरत को समझ रहे हों, लेकिन स्कूलों में यौन शिक्षा के मुद्दे पर आम सहमति कभी बन ही नहीं पाई। 2००9 में संसदीय समिति की बैठक में इस पर आम सहमति नहीं बनी थी। समिती ने तब माना था कि ‘किशोरों के मानसिक और शारीरिक विकास’ और ‘एचआईवी/एड्स एवं अन्य यौन संक्रामित बीमारियों’ के चेप्टर को बायलॉजी के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। आशय यही था कि यौन शिक्षा ज्यादा खुला विषय है। हमारे देश में बच्चों पर बढ़ते खतरों के बावजूद इस विषय को लेकर एक हिचक दिखाई देती रही है।

समाज सेविका नूतन ठाकुर कहती हैं कि ‘जिस समाज में 55 प्रतिशत बच्चों का यौन शोषण होता है, जिनमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल हैं वहां भारतीय संस्कृति के नाम पर किसी जरूरी विषय से परहेज समझ से परे है। यह तो हमें ही तय करना होगा कि हमारे लिए संस्कृति महत्वपूर्ण है या फिर नई पीढ़ी का भविष्य। पता नहीं क्यों अभिभावक ऐसे विषयों पर बात करने में इतना हिचकिचाते क्यों हैं जबकि वह हमारी जिदगी का हिस्सा है। हमारे यहां तो आदिवासी समाज में भी घोटुल जैसी परंपरा है जो एकदूसरे को समझने पर आधारित है।’

व्यापक सहमति से बनेगी बात

यौन शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर बात करते हुए इसकी भी चर्चा होती रही है कि इसे किस रूप में लागू किया जाए। पश्चिमी देशों का मॉडल हमारे लिए कितना उपयुक्त है इस बारे में मनोविज्ञानिक डॉ पी. के. दलाल कहते हैं, ‘सैद्धांतिक रूप से देखें तो अगर अज्ञान के कारण बच्चों का कुछ नुकसान हो रहा है तो हमें ऐसा नहीं होने देना चाहिए। लेकिन कब, क्या और कैसे किया जाए इस पर व्यापक सहमति बननी चाहिए।

आज सामाजिक स्थितियों पर भी गौर किया जाना जरूरी है। विदेशों की सामाजिक मान्यताओं में घुलने-मिलने की ज्यादा आजादी है और वहां इस बात की जरूरत महसूस की गई थी कि अगर बच्चों को जानकारी नहीं दी तो ज्यादा नुकसान होगा लेकिन हमारे यहां सामाजिक मान्यताएं अलग हैं। हम पश्चिम के मॉडल को पूरी तरह नहीं अपना सकते।’

  • बच्चों के लिए यौन शिक्षा की जरूरत से इनकार करना कठिन है लेकिन सारी बहस यहीं आकर सिमट जाती है कि उसका तरीका क्या हो? क्योंकि यह विषय जितना संवेदनशील और महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण है इसका तरीका।
  • प्राथमिक विद्यालय मिरानपूर पिनवट के प्रधानाचार्य सतीश कुमार लाल बताते हैं, ‘यौन शिक्षा जैसे विषयों पर बहस पहले भी होती रही है और पहले भी इसका विरोध करते रहे हैं।
  • आज के समय में इसकी बहुत ज्यादा जरूरत है क्योंकि बच्चों के कई प्रश्नों का हमारे पास जवाब नहीं है।
  • इस समय यह सोचना कि शिक्षक इस विषय के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे पूरी तरह ठीक नहीं है क्योंकि कुछ शिक्षक तो संवेदनशील हैं और उनमें विषयों की समझ भी है।
  • मैं मानता हूं कि जरूरत होने के बावजूद इसे लागू करना आसान नहीं है।’

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