काम करने के बाद भी आप रहें बच्चों की नजर में

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माता-पिता को बच्चों की परवरिश में बहुत धैर्य की जरूरत होती है, परंतु आज के बदलते समय में बढ़ते घर खर्चों के चलते पति-पत्नी दोनों को ही काम करना पड़ता है। आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह बिल्कुल ठीक है मगर कहीं न कहीं बच्चों पर कम ध्यान देने की वजह से इस तरह के अभिभावकों से उनकी संतानों की अपेक्षाएं थोड़ी भिन्न होती हैं। यदि आप दोनों भी कामकाजी हैं और बच्चों को आया या डे-केयर इंचार्ज संभालती है तो थोड़े संयम व सावधानी की आवश्यकता होती है। काउंसलर विद्या सिंह मानती हैं कि यदि पति-पत्नी दोनों विवाह पश्चात काम करना चाहते हों तो काउंसलिग बहुत आवश्यक है।

मनोचिकित्सक की नजर से

मनोचिकित्सक नम्रता सिंह का मानना है कि आप बच्चों की अपेक्षाओं पर खरे उतर सकते हैं। जरूरत थोड़ी सावधानी और धैर्य की है। घर की स्थितियों को बेहतर बनाने के लिये पति- पत्नी दोनों का काम करना कोई गलत नहीं है पर जरूरी है कि आप अपने बच्चों के साथ कैसे पेश आते है।

इसके कुछ उपाय भी हैं…

  • काम का कितना भी स्ट्रेस क्यों न हों बच्चों के साथ प्यार से पेश आइए। बच्चे वैसे भी ‘स्ट्रेस रिलीवर्स’ होते हैं। हो सकता है उनसे मिलकर आप ऑफिस का तनाव ही भूल जाएं।
  • ऑफिस से आकर थोड़ा विश्राम करें। आपका मन हल्का होगा तो ही बच्चों के साथ आप आनंद ले सकेंगे।
  • ऑफिस से आते वक्त ही बाहर के सभी काम कर लीजिए। बार-बार घर से बाहर मत जाइए।
  • हर बच्चे के लिए कुछ अलग समय निश्चित करें। उनके साथ घुल मिलकर रहें। बातचीत का विषय उन्हें चुनने दें। ऐसे जताइए जैसे आप उनकी सभी बातें समझ रहे हैं।
  • ऐसा करने से बच्चों के आत्सम्मान की भावना को बल मिलता है। अगर डांट जरूरी हो तो उन्हें अकेले में डांटिए। अपनी असफलता का निशाना कभी बच्चों को मत बनाइए।
  • सुबह जो बातें आप बच्चों को कहते हैं दिनभर उनके मस्तिष्क में वे ही घूमती हैं इसलिए बातचीत का ध्यान रखें।
  • बच्चों चूमना, थपथपाना ना भूलें। हौसला बढ़ाने के लिए और अंतरंगता स्थापित करने का यह अच्छा उपाय है।
  • बच्चों को यदि अकेले रहना पड़ रहा है तो पहले इस बात को निश्चित करें कि आपका घर बिल्कुल सुरक्षित है। बच्चों को हर स्थिति से निपटने के लिए हर रोज थोड़ी-थोड़ी सीख देते रहिए। जैसे- अनजान लोगों के लिए दरवाजा न खोलना, हर किसी को यह न बताएं कि मम्मी-पापा दोनों ही घर पर नहीं हैं, घर की चाबी खो जाना, घर में आग लग जाने पर कैसे रिएक्ट करना है यह सब बातें बच्चों को समझा कर रखें।
  • आपके मोबाइल व लैंडलाइन नंबर बच्चों को पता होने चाहिए ताकि इमरजेंसी में वे आपसे कॉन्टेक्ट कर सकें।
  • फायर ब्रिगेड पुलिस एम्बुलेंस के बारे में भी उन्हें बता कर रखें। पड़ोसियों व रिश्तेदारों के फोन नंबरों का पता बच्चों को होना चाहिए ताकि काम पड़ने पर बच्चे उनसे बात कर सकें।

अभिभावकों का कामकाजी होना बुरा नहीं है पर बच्चों की देखभाल अच्छी तरह होना चाहिए। अगर माता-पिता उनकी आवश्यकताओं पर ध्यान दें तो अपने कार्य के साथ बच्चों के प्रति दायित्व भी बखूबी निभा सकते हैं। परामदर्शदात्री रीमा महाजन कहती हैं कि आप जितने समय भी अपने बच्चों के साथ रहते हैं उनके साथ मित्रता के साथ रहें। अब वह समय नहीं रहा जब माता-पिता ने जो कह दिया वही सही है। अब समय बदल गया है, बच्चे मुखर हो गए हैं। उनका अपना नजरिया है। माता-पिता को यह करना है कि बच्चों के साथ बॉस या हिटलर की तरह नहीं बल्कि दोस्त बनकर रहें। आपका यह तरीका बच्चों को आपके करीब लाएगा। वे आपसे खुलकर बात कर पाएंगे। अगर आपके और बच्चे के बीच संवाद में किसी भी प्रकार की दूरी होगी तो आप बच्चे की मनास्थिति को नहीं समझ सकेंगे।

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