बेचारे पति!

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मुझे मेरे पति या ससुराल वालों से बचा लो …यह शब्द तो आम है। लेकिन अगर कोई यह कहे कि मुझे मेरी पत्नी या बहू से बचा लो तो सुनने में अटपटा जरूर लगेगा। लेकिन यह वर्तमान दौर की एक दबी हकीकत है। आज महज पत्नियां ही पीड़ित नहीं है। पत्नी पीड़ित पतियों की संख्या भी कुछ कम नहीं है। वे बस महज समाज में बदनामी के डर से चुप रहने को मजबूर हंै। आईपीसी की धारा 498 ए जहां पतियों के लिए एक पत्नी फोबिया है वहीं पत्नियों के लिए वह किसी रायफल से कम नहीं है।

संयुक्त परिवार, गृह-कलह, बेवजह शक, घर-जंवाई, आधुनिकता की आंधी जैसे अनेक कारण हैं जो पुरुषों के शोषण की वजह बनकर उभर रहे हैं। कुछ महिलाएं अपनी जायज-नाजायज हर मांग को इस एक्ट की धमकी से मनवाने से नहीं चूकती हैं। अनेक मामलों में यह देखने में आता है कि पुलिस महिला उत्पीड़न के मामलों में महिलाओं का ही पक्ष लेकर मामले की जांच करती है। जिससे कई बार वे परिवार दोषी सिद्ध हो जाते है जिनका बहू को सताने का कभी इरादा नहीं रहा है।

आज अदालतें खुद यह मान चुकी हैं कि कई बार महिलाएं बदला लेने के मकसद से झूठे केस दर्ज करवा देती हैं और महिला के अधिकारों की रक्षा के लिए बने कानून बेगुनाह पुरुष के उत्पीड़न का हथियार बन जाते हैं। आज जब महिलाओं के पास एक बार फिर कानूनी ताकत आ रही है तो क्या पुरुषों के साथ भी अत्याचार नहीं होने लगा है, भले ही अभी इसे शुरुआत कहा जाए । कहा जाता है कि जिसके पास सत्ता होती है वह शोषणकारी होता है और उसका इंसानी मूल्यों के प्रति कोई सरोकार नहीं रहता।

लेकिन क्या ऐसे कभी महिला-पुरुष की भूमिका में समानता आ सकती है? समाज में आज यह एक यक्ष प्रश्न है।

केस 1: आलमबाग निवासी पेशे से शिक्षक धनंजय शुक्ला कहते हैं कि मैं घर का इकलौता हूं। करीब दो साल पहले शादी हुई थी। पत्नी संगीता पापा-मम्मी से अलग रहना चाहती थी। जब मैने विरोध किया तो उसने मायके वालों से इसकी शिकायत कर दी है, जिससे अब उसके घरवाले 498 ए की धमकी देकर परिवार से अलग कराने में लगे हैं। अब समझ नही नहीं आ रहा है कि परिवार की मानूं या बीवी के घरवालों की। मेरी तो जिंदगी तितर बितर हो गई है।

केस 2: पारा निवासी इंजीनियर राजीव बताते हैं कि एक साल पहले उन्होंने अपनी कलीग पूजा से दिल्ली में लव मैरिज की थी। शादी के कुछ महीने तो सब ठीक रहा लेकिन उसे शक हो गया कि मेरा किसी और से अफेयर है। मैने उसे बहुत समझाया लेकिन वह कुछ भी मानने को तैयार नहीं है। अब वह कभी तलाक की धमकी तो कभी दहेज एक्ट में फसाने की धमकी दे रही है। समझ में नहीं आ रहा है कि मै क्या करूं?

केस 3: आर्मी से रिटायर्ड यशवंत चौहान बताते है कि इकलौते बेटे की शादी को महज छह माह ही हुए है कि बहू जींस पहनने की जिद कर रही है, जबकि मैंने सूट पहनने की इजाजत दे रखी है। करीब एक महीने पहले बेटे ने कहा कि पापा घर में शांति चाहते हो तो जींस पहनने दो, क्योंकि आपकी बहू पूजा दहेज के मामले में फंसाने की धमकी दे रही है। ऐसे में समाज में बदनामी के डर से तब से लेकर आज तक मुझे मजबूरी में बहू की हर बात माननी पड़ती है।

केस 4: नेवी में तैनात आशिफ खान कहते हैं कि वर्तमान में उनकी पोस्टिंग मुम्बई में है। पत्नी यहीं लखनऊ में रह रही है लेकिन वह हमारे साथ जाने की जिद कर रही है। मैंने मना किया तो उसने अपने मायके में फोन करके मारपीट व प्रताड़ित किए जाने की बात कह दी, जिस पर उसके पापा ने कहा कि बेटी को साथ ले जाओ वरना धारा 498 ए के तहत जेल की हवा खाने को तैयार रहो।

केस 5: एक फाइनेंस कम्पनी के एंप्लॉई अजीत परिहार बताते हैं कि घर में भाई की पत्नी ने आपसी मतभेद के चलते करीब 3 साल पहले पूरे परिवार को धारा 498 ए लगाकर कठघरे में खड़ा कर दिया। बहू की इस करामात से उनके बच्चों की पढ़ाई बरबाद हो गई है। मेरी और भाई की नौकरी भी छूट गई। आज पूरा परिवार सड़क पर आ गया है।

केस 6: कपड़ा व्यापारी अनुज कहते हैं कि एक साल पहले शादी हुई है। शादी से पहले पत्नी रोली का अफेयर था। जब उसे जानकारी हुई तो उसने उसे प्रेमी से बात करने को मना किया और कहा कि जो था उसे भूल जाओ और नए सिरे से जिंदगी जियो, लेकिन वह नहीं मानी। घरवालों ने भी जब विरोध करना शुरू किया तो वह दहेज एक्ट में फंसाने की धमकी देकर तीन माह पहले मायके चली गई है।

ये मामले तो महज बानगी है। यह दास्तान कुछ लोगों की नहीं बल्कि हजारों लोगों की है। जो समाज में हंसी व पत्नी पीड़ित पति के तमगे से बचने के लिए चुप रहते हैं। वे न चाहते हुए वह सब करते हैं जो पत्नी या बहू करवाना चाहती है। जबकि कानून पीड़ितों की हिफाजत के लिए है, लेकिन कुछ कानून ऐसे है जिनका आज के दौर में गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। अधिकांश महिलाएं दहेज एक्ट को सुरक्षा कवच मानकर उसका मन मुताबिक उपयोग कर रहीं है। उनके इस कदम से कई बार बेकसूर पुरुष आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं। क्योंकि वे मानसिक तौर पर कमजोर हो जाते हैं।

अनेक परिवारों को समाज में बदनामी के साथ ही कोर्ट कचहरी के चक्क र में उनका पैसा और समय दोनो ही बरबाद होता है। आज अदालतों में 8०० से 12०० संख्या में मुकदमे लम्बित पड़े हैं। नेशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक दहेज में मरने वाली महिलाओं की तुलना में पुरुषों की संख्या दोगुनी है। हर 9 मिनट में घरेलू हिंसा एक्ट से आजिज पुरुष अपनी जान दे रहा है।भारत में हर साल करीब 5० से 6० हजार पुरुष 498 ए के मामले में आत्महत्या करते हैं।

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