डांट कितनी जायज!

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बच्चों का मन बहुत ही कोमल होता है। मां-बाप सोचते हैं मैने तो परवरिश में कोई कमी नहीं की। हर सुख सुविधायंे उपलब्ध करायी है। बावजूद इसके बाद भी उनके बच्चे तनाव में रहते हैं। बावजूद इसके क्षमता के अनुरूप बच्चे परफॉर्म नहीं कर पातें हैं। आखिर इसकी वजह क्या है? यह सवाल आज एक बड़ी समस्या के रूप में उभर कर सामनें आ रहे हैं। जबकि कई बार तो ऐसा होता है कि मां-बाप बच्चों को छोटी-छोटी बातों पर इतना डांटतें है कि बच्चे डिप्रेशन में चले जाते हैं।

बचपन में जहां मां का आंचल बच्चे को संतुष्टि देता है वहीं किशोरावस्था में उसे पिता के संबल की जरूरत होती है। इस उम्र में बच्चों में मानसिक और शारीरिक बदलाव आते हैं। वे अलग तरह की चीजों केे प्रति आकर्षित होने लगते हैं। ऐसे में बच्चों को दोस्त की तरह समझाना चाहिए। ज्यादातर बच्चों की शिकायत है कि उन्हें आजकल प्यार से समझाने की जगह सिर्फ डांट कर समझाया जाता है।

जासूस होती हैं मां

आज के दौर में अधिकांश मांएं अपने बच्चों की जासूसी करती हैं। उनके मुकाबले पिता कम जासूसी करते हैं। बच्चों बार-बार क्रॉसचैक किया जाता है। छोटी-छोटी बातों में भी टोका-टाकी चलती रहती है। इससे बच्चों पर नकारात्मक असर पड़ता है। जासूसी का शिकार अधिकतर लड़कियां होती हैं। अक्सर बच्चों के अपोजिट जैंडर वाले दोस्तों के बारे में शक किया जाता है। इससे बच्चे काफी तनाव में रहते हैं और स्टडी तक ठीक से नहीं कर पाते। जिससे इसका प्रभाव कई बार बच्चों के परीक्षा परिणाम पर भी पड़ता है। जबकि आज के दौर में बच्चे चाहतें हैं कि अभिवावक उनके साथ दोस्त जैसा व्यवहार करें।

पिता नहीं देते समय

स्कूलों में पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग में औसतन 5० प्रतिशत पेरेंट्स ही पहुंचते हैं। इनमें से भी 7० प्रतिशत से ज्यादा में सिर्फ मां ही आती हैं। ऐसे में बच्चा अपना पक्ष ठीक से नहीं रख पाता, उसकी बात पर भी ज्यादा गौर नहीं किया जाता। मीटिंग में पेरेंट्स या खासकर पिता के कम आने की बात को बिजनेस या ऑफिस में बिजी होने की बात कह टाल दिया जाता है। आमतौर पर बच्चों की पेरेंट्स मीटिंग के नाम पर पिता यही जवाब देते हैं कि हां देखते हैं या मैं छुट्टी नहीं कर सकता, मम्मी चली जाएंगी।

इससे बच्चे उदासीन होने लगते हैं। ज्यादातर परेशानियों को बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है, लेकिन यह तभी संभव है जब बच्चा, पेरेंट्स और टीचर्स तीनों को तसल्ली से अपनी बात कहने का अवसर मिले, लेकिन अक्सर इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता। परेशानी होने पर जेनरेशन गैप का नाम दे पल्ला झाड़ लिया जाता है।

परिजनों के पास वक्त की कमी

माता-पिता डिस्टर्ब करते हैं बच्चा पढèने के लिए बैठा और घंटी बजी, देखो जरा कौन आया है। फोन की घंटी बजी, देखो किसका फोन है। अक्सर घरों में पढèते वक्त बच्चों को इस तरह से डिस्टर्ब किया जाता है। वह कहते हैं, मां बाप शिकायत करते हैं कि बच्चे का पढèने में मन नहीं लगता या वो पढèने नहीं बैठता। हालांकि, इसकी वजह तो वे खुद ही होते हैं। जब बच्चा मूड ठीक करने करने के लिए टीवी देखता है या खेलता है तो उसे ताने मारे जाते हैं या मना कर दिया जाता है। ऐसे में बच्चे स्टडी पर ठीक से ध्यान नहीं दे पाते।

घर में कलह

अक्सर यह देखने में आता है कि बच्चा अपने रूम में स्टडी कर रहा है, तभी अचानक पास वाले रूम से मां-बाप के लड़ने की आवाज आती है। उस दौरान मां-बाप ये नहीं समझते हैं कि उनकी लड़ाई से घर के माहौल पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। बच्चे की स्टडी पर इसका कितना बुरा असर होता है। इसके साथ घर में अगर कोई सदस्य बीमार है और घर में हमेशा उसकी बीमारी पर ही चर्चा होती है तो इससे भी बच्चे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बच्चे को बीमार व्यक्ति के उपचार व उसकी देखभाल के लिए प्रेरित करें लेकिन उसके मानसिक विकास पर प्रभाव न पड़ने दें।

छोटी-छोटी बातों पर डांटना

अगर बच्चे ने कोई गलती की तो उसे डांट पड़ जाती है लेकिन किस वजह से उसे डांट पड़ रही है उसे यह कोई नहीं बताता। कई बार ऐसा होता है कि उसकी कोई गलती नहीं होती तो भी उसे डांट दिया जाता है।अक्सर बच्चों को लगता है कि उन्हें फिजूल में डांटा गया। जहां परिवार की छोटी-छोटी बातें भी बच्चे को तनाव देती हैं वहीं स्कूल का माहौल भी उसकी मानसिकता पर असर डालता है।

भेदभाव करते हैं टीचर

क्लास में विभिन्न तरह के परिवारों के बच्चे पढèते हैं, लेकिन उन सभी को एक ही तरह से ट्रीट किया जाता है। अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए इन बच्चों को जब एक ही तरह से ट्रीट किया जाता है तो इनमें असंतोष की भावना उत्पन्न होती है। कई मामलों में यह देखने को मिलता है कि टीचर बच्चों के साथ पक्षपात वाला रवैया अपनाते हैं। छोटी-छोटी गलतियों पर उन्हें डांटते हैं। जिससे वह कक्षा के साथ-साथ सामाजिक तौर पर भी कमजोर हो जाते हैं। ऐसे में परिजनों को विश्ोष ध्यान देना चाहिए और बच्चे से समय-समय पर खुलकर हर मुद्दे पर बात करते रहना चाहिए। ध्यान रहे, यदि इन बातों पर आप नजर रखेंगे तो आपका बच्चा अवश्य होनहार निकलेगा, आखिर यही तो चाहते हैं न आप…।

 

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